फज़ाइले क़ुर्बानी

*मसाइले क़ुर्बानी-4*




*मसअला* - क़ुर्बानी का गोश्त काफिर को हरगिज़ ना दें और बदमज़हब मुनाफिक़ तो काफिर से बदतर है लिहाज़ा उसको भी हरगिज़ ना दें

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15,सफह 144

*ⓩ वहाबी देवबंदी क़ादियानी खारजी राफज़ी अहले हदीस जमाअते इस्लामी और जितने भी बद मज़हब फिरके हैं उन सबको क़ुर्बानी का गोश्त नहीं दे सकते अगर देंगे तो गुनहगार होंगे*

*मसअला* - जो जानवर को ज़बह करे बिस्मिल्लाह शरीफ वोह पढ़े किसी दूसरे के पढ़ने से जानवर हलाल ना होगा

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15,सफह 121

*ⓩ बेहतर है कि जिसके नाम से क़ुर्बानी हो रही है वो बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर कहकर छुरी चलाये वरना जो भी ज़बह करे वो पढ़े*

*मसअला* - ज़बह के वक़्त जानबूझकर बिस्मिल्लाह शरीफ ना पढ़ी तो जानवर हराम है और अगर पढ़ना भूल गया तो हलाल है

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15,सफह 119
📕 ज़बीहे इसाले सवाब,सफह 15

*ⓩ सुन्नी साहियुल अक़ीदा मुसलमान जान बूझकर ऐसा कर ही नहीं सकता हां निस्यानन यानि भूल से ही ऐसा हो सकता है लिहाज़ा सुन्नी का ज़बीहा हलाल है लेकिन अगर किसी सुन्नी ने जानबूझकर बिस्मिल्लाह नहीं पढ़ा तो जानवर हराम युंहि अगर वहाबी बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़कर भी ज़बह करे तब भी वो ज़बीहा हराम हराम हराम मिस्ल सुअर है क्योंकि वो काफिरो मुर्तद है*

*मसअला* - ज़बह करते वक़्त जानवर की गर्दन अलग हो गई या जानबूझकर भी अलग कर दी तो ऐसा करना मकरूह ज़रूर है मगर जानवर हलाल है

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15, सफह 118

*ⓩ बकरे वगैरह में तो ऐसा कम ही होता है जबकि आम दिनों में मुर्गे को ज़बह करने में ऐसा हो सकता है कि सर पूरा अलग हो जाये बहरहाल गर्दन किसी की भी कट जाये जानवर हलाल ही रहेगा*

*मसअला* - बड़े जानवर के 7 हिस्सों मे अगर 1 वहाबी बदमज़हब की शिरकत हुई तो किसी की क़ुर्बानी नहीं होगी इसका खास ख्याल रखें

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 5,सफह 142

*ⓩ इसी तरह अगर किसी की नीयत गोश्त खाने की हो और वो क़ुर्बानी महज़ खाना पूरी को कर रहा हो जैसे कि आज कल अक्सर देखा जाता है कि कई लोग बकरा करने के बा वजूद बड़े जानवर में हिस्सा लेते हैं तो अगर उनकी नीयत क़ुर्बानी की ही है तो बहुत अच्छा लेकिन अगर उनकी नीयत ये है कि बड़े का गोश्त बाट दिया जायेगा और बकरा रख लिया जायेगा तो ऐसी सूरत में नियत क़ुर्बानी की ना हुई तो किसी की भी क़ुर्बानी ना होगी मगर चुंकि नियत का हाल तो खुदा ही बेहतर जानता है इसलिए उल्मा फरमाते हैं कि अगर चे उसकी क़ुरबानी तो ना हुई मगर क़यामत के दिन उससे इसके मुताल्लिक़ सवाल ना होगा यानि इसका गुनाह नहीं पड़ेगा*

*मसअला* - बेहतर है कि गोश्त के 3 हिस्से किये जायें 1 अपने लिये 1 रिश्तेदारों के लिये और 1 अपने पड़ोसियों के लिये रखे लेकिन अगर परिवार बड़ा है तो पूरा का पूरा गोश्त भी अपने लिये रख सकता हैं,मगर जो भी करे पर अपने गरीब पड़ोसियों का ख्याल ज़रूर रखे

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 5,सफह 144

*मसअला* - हलाल जानवर के भी 22 आज़ा का खाना मना है सबकी तफसील हस्बे ज़ैल है 1. पित्त 2. मसाना 3. मादा की फर्ज 4. नर का ज़कर 5. बैदा यानि कपूरा 6. रगों का खून 7. गदूद 8. हराम मग्ज़ 9. गर्दन के दोनों पुट्ठे जो शाना तक खिंचे होते हैं 9. जिगर का खून 10. तिल्ली का खून 11. गोश्त का खून 12. दिल का खून 13. सुफ्रा वो ज़र्द पानी जो पित्ते में होता है 15. अलक़ा यानि वो खून जो रहम में नुत्फे से बनता है 16. दुबुर यानि पखाने का मक़ाम 17. ओझड़ी 18. आंत 19. नुत्फा यानि मनी 20. नुत्फा अगर चे गोश्त बन गया हो 21. वो बच्चा जो मुर्दा निकला हो 22. नाक की रतूबत 

📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 8,सफह 324

जारी रहेगा...........

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वहाबी देवबन्दी का ज़बीहा हराम है

Qurbani Ka Janwar Kharid’te Waqt Kin Baato Ka Khayal Rakhe

एक शख़्स के पास इतना माल नहीं कि निसाब को पहुंचे लेकिन खेती की ज़मीन निसाब से कई गुना ज़्यादा है उस पर कुर्बानी वाजिब है या नहीं*10