फज़ाइले क़ुर्बानी

*मसाइले क़ुर्बानी-2*



*मसअला* - साहिबे निसाब यानि जिसके पास 7.5 तोला सोना या 52.5 तोला चांदी या इसके बराबर की रक़म जो कि तक़रीबन 26000 रू बन रही है अगर क़ुर्बानी के दिनों में मौजूद है तो उस पर क़ुर्बानी वाजिब है,क़ुर्बानी वाजिब होने के लिये माल पर साल गुज़रना ज़रूरी नहीं

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15,सफह 132

*ⓩ जिसके पास 26000 रू कैश या इतने का सोना-चांदी या हाजते असलिया के अलावा कोई सामान है तो क़ुर्बानी वाजिब है युंही साल भर तो फक़ीर था मगर क़ुर्बानी के 3 दिनों में कहीं से उसे 26000 रू मिल गया क़ुर्बानी वाजिब हो गयी,किसी के पास कई मकान हैं और वो सब उसके खुद के रहने के लिए है अगर चे वो करोड़ों की कीमत रखते हों तब भी वो हाजते असलिया में दाखिल है क़ुर्बानी नहीं लेकिन अगर किसी मकान में किरायेदार को बसा दिया और उसका किराया इतना है कि निसाब को पहुंच जाये तो क़ुर्बानी वाजिब होगी,उसी तरह दुकानदार का काम करने का सामान मस्लन उसके औज़ार मशीनें फर्नीचर पर्सनल इस्तेमाल का सामान हाजते असलिया में दाखिल है,एसी-फ्रिज-बाईक-फोर व्हीलर अगर चे कई सारी मौजूद हो फिर भी ये सब हाजते असलिया में दाखिल हैं मगर टी.वी हाजते असलिया में दाखिल नहीं है तो अगर किसी के पास 26000 रू की टीवी मौजूद है तो उस पर क़ुर्बानी वाजिब है,रमज़ान शरीफ में जब मैंने यही मैसेज ज़कात के तअल्लुक़ से बताया तो कई लोगों ने ऐतराज़ किया था कि टीवी पर ज़कात कैसे निकाली जा सकती है तो इसका जवाब ये है कि मैंने टीवी पर ज़कात नहीं निकलवाई थी बल्कि उस माल पर ज़कात देनी होगी जो कि एक हराम चीज़ में फंसा रखी है ये आलये गुनाह है जिसकी उल्मा हरगिज़ इजाज़त नहीं देते तो अब 26000 रू की टीवी खरीदना फिज़ूल ही तो हुआ लिहाज़ा उस माल पर ज़कात भी निकलेगी और क़ुर्बानी भी वाजिब होगी*

*मसअला* - साहिबे निसाब औरत पर खुद उसके नाम से क़ुर्बानी वाजिब है,मुसाफिर और नाबालिग पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15,सफह 132

*ⓩ औरत के पास जे़वर हैं मगर शौहर साहिबे निसाब नहीं यानि 26000 का मालिक नहीं है तो औरत पर क़ुर्बानी वाजिब है मर्द पर नहीं,इसी तरह मुसाफिर यानि जो अपने वतन से 92.5 किलोमीटर दूर गया और वहां 15 दिन से कम ठहरना है तो उस पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं और अगर 15 दिन से ज़्यादा ठहरना है तो क़ुर्बानी वाजिब है,क़ुर्बानी वो परदेस में भी करा सकता है या उसके घर पर ही कोई उसके नाम से करा दे मगर उसकी इजाज़त होनी चाहिए दोनों सूरतों में क़ुर्बानी हो जायेगी,युंही मुसाफिर अगर फिर भी क़ुर्बानी करना चाहता है तो कर सकता है नफ्ल हो जायेगी सवाब मिलेगा*

*मसअला* - जो साहिबे निसाब है उस पर हर साल क़ुर्बानी वाजिब है उसे हर साल अपने नाम से क़ुर्बानी करनी होगी कुछ लोग 1 साल अपने नाम से क़ुर्बानी करते हैं दूसरे साल अपने बीवी बच्चों के नाम से क़ुर्बानी करते हैं,ये नाजायज़ है

📕 अनवारुल हदीस,सफह 363

*ⓩ इसी तरह अवाम में ये भी मशहूर है कि पहली क़ुर्बानी हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के नाम से करनी चाहिए ये भी सही नहीं है,हां जैसा कि मैं पहले बता चुका कि अगर इस्तेताअत हो तो 2 क़ुर्बानी का इंतेज़ाम करे एक अपने नाम से और एक हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के नाम से ये अच्छा है और अगर खुद पर क़ुर्बानी वाजिब है और एक ही क़ुर्बानी करता है मगर किसी और के नाम से तो वाजिब का तर्क हुआ गुनहगार होगा*

*मसअला* - क़ुर्बानी का वक़्त 10 ज़िल्हज्ज के सुबह सादिक़ से लेकर 12 के ग़ुरुबे आफताब तक है,मगर जानवर रात में ज़बह करना मकरूह है

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15,सफह 136

जारी रहेगा...........

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