फज़ाइले क़ुर्बानी
*Post-1*
*फज़ाइले क़ुर्बानी*
*फुक़्हा* - जिन लोगों पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं वो अगर ज़िल्हज्ज के 10 दिनों तक बाल नाखून ना काटें तो क़ुर्बानी का सवाब पायेंगे
📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15,सफह 131
*ⓩ आज चांद की 29 तारीख है लिहाज़ा बाल नाखून वग़ैरह काट लें जिन पर क़ुर्बानी वाजिब है वो तो ऐसे ही क़ुर्बानी तक रुके रहें उनके लिए यही अफज़ल है लेकिन अगर गलती से या जानबूझकर भी नाखून या बाल कटवा लिया तो भी अपने नाम से क़ुर्बानी करा सकता है,मखसूस जानवर को मखसूस दिन ज़बह करने को क़ुर्बानी कहते हैं,क़ुर्बानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है जो इस उम्मत में भी बाकी रखी गयी है,मौला तआला क़ुर्आन में इरशाद फरमाता है कि*
*कंज़ुल ईमान* - अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ो और क़ुर्बानी करो
📕 पारा 30,सूरह कौसर,आयत 2
*ⓩ आज कल एक मैसेज आ रहा है कि इसको बक़र ईद ना कहें बल्कि ईदुल अज़हा कहें तो ईदुल अज़हा कहना अच्छा है मगर ये कि बक़र ईद ना कहें ये सिवाए जिहालत के और कुछ नहीं है,बक़र माने गाय होती है और इस नाम से क़ुर्आन में पूरी एक सूरह सूरह बक़र के नाम से मौजूद है तो जो लोग बक़र ईद ना कहने के लिए मैसेज कर रहे हैं ऐसे जाहिलों को चाहिए कि वो इस सूरह का नाम भी बदल कर अपने हिसाब से कुछ अच्छा सा रख लें,खैर बक़र ईद कहना हमारे अस्लाफ से साबित है जैसा कि फक़ीहे मिल्लत मुफ्ती जलाल उद्दीन अहमद अमजदी अलैहिर्रहमा ने अनवारुल हदीस में कई जगह बक़र ईद तस्नीफ फरमाया है,चलिये अब कुछ हदीसे पाक इस बारे में मुलाहज़ा फरमा लें*
*हदीस* - हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि क़ुर्बानी के दिनों में अल्लाह को क़ुर्बानी से ज़्यादा कोई अमल प्यारा नहीं और जानवर का खून ज़मीन पर गिरने से पहले क़ुबुल हो जाता है,और क़ुर्बानी करने वाले को जानवर के हर बाल के बदले 1 नेकी मिलती है
📕 अबु दाऊद,जिल्द 2,सफह 264
*ⓩ यानि साहिबे निसाब अगर 5000 की क़ुर्बानी ना करके 5 करोड़ रुपया भी सदक़ा कर देगा तब भी सख्त गुनाहगार होगा लिहाज़ा क़ुर्बानी ही की जाए अगर इतनी इस्तेताअत ना हो कि बकरा खरीद सके तो बड़े जानवर में हिस्सा ले सकता है,और जिस पर क़ुर्बानी वाजिब है यानि साहिबे निसाब तो है सोने चांदी का मालिक है मगर पास में पैसा नहीं है तो ऐसी सूरत में कुछ बेचकर या कर्ज़ लेकर क़ुर्बानी करनी होगी अगर नहीं करेगा तो गुनाहगार होगा*
*हदीस* - हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि जो इसतेताअत रखने के बावजूद क़ुर्बानी ना करे तो वो हमारी ईदगाह के क़रीब ना आये
📕 अबु दाऊद,जिल्द 2,सफह 263
*ⓩ सोचिये ऐसे शख्स को जो कि क़ुर्बानी की ताक़त रखने के बावजूद भी क़ुर्बानी ना करे उसको हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम नमाज़ पढ़ने की भी इजाज़त नहीं दे रहे हैं खुदारा ऐसी वईद में गिरफ्तार ना हों अगर साहिबे निसाब हैं तो ज़रूर ज़रूर क़ुर्बानी करें*
*हदीस* - नबी करीम सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम ने 2 मेढ़ों की क़ुर्बानी की जो कि खस्सी थे
📕 इब्ने माजा,हदीस 3122
*ⓩ हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम एक क़ुर्बानी अपनी तरफ से पेश करते और एक अपनी उम्मत में उन लोगों की तरफ से जो साहिबे इस्तेताअत ना होते लिहाज़ा अगर कोई ऐसा शख्स हो जो अपनी तरफ से क़ुर्बानी का इरादा रखता हो और साहिबे हैसियत हो तो एक क़ुर्बानी हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम की तरफ से भी पेश करे तो ज़हे नसीब,और खस्सी के मसले पर जाहिलों की दलील ना सुनें कि जब खस्सी कर दिया तो जानवर एैबी हो गया बस इतना याद रखें कि हमें हुक्म किस चीज़ का मिला है जो हमें हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बताया हम वो जानते हैं बाकी दुनिया की मन्तिक और क्यों कैसे से हमें मतलब नहीं*
*हदीस* - हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने हाथों से जानवरों को ज़बह फरमाते थे
📕 मुस्लिम,जिल्द 2,सफह 691
जारी रहेगा...........
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें