ग़ैरों की दावत करना या उनकी दावत में खाने जाना

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*🥀 ग़ैरों की दावत करना या उनकी दावत में खाने जाना 🥀*



*✏️ वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस, (ग़ैर मुस्लिम) की दावत में जाना*
देखें जैसा कि हमारे अकाबिर ओलमाये कराम शरीअत का हुक्म बयान फ़रमाते हैं और बताते हैं कि मुसलमानों को ग़ैरों से सिर्फ दुनियावी तअल्लुक़ात होने चाहिए जो कि सिर्फ दुनियावी ज़रूरत के मद्दे नज़र हों, बाकी उनसे इतना मेल जोल की उनके दावत में जाए, हुज़ूर सदरुश्शरियह عليه الرحمة इरशाद फ़रमाते हैं कि मुसलमानों को मुतलक़न काफ़िरों से इज्तिनाब चाहिए ना कि इतना मेल जोल की दावत में शिरकत हो क्यूंकि ये नजाएज़ है,

*वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस, (ग़ैर मुस्लिम) की दावत करना*
ठीक उसी तरह से ग़ैरों की दावत करने पर हुक्म बयान फ़रमाते हैं कि कुफ़्फ़ार से मेल जोल सिर्फ़ दुनियावी ज़रूरत जैसे तिजारती या नौकरी के मामलात तक हों ना कि इतना कि उनकी दावत की जाए और दस्तरख़्वान एक किया जाए ये जाएज़ नही,

लिहाज़ा हमें चाहिए कि हत्तल इमकान कोशिश ये करें कि ग़ैरों की दावत में जाने से बचें और उनकी दावत करने से भी बचें क्यूंकि ये जाएज़ व दुरुस्त नही, हां आज के वक़्त में तिजारती और नौकरी के हालात में अक्सर ऐसे वक्त आते हैं कि मजबूरी होती है तो उस वक़्त अगर मुमकिन हो तो एहतिजाज़ (बचने की कोशिश) करें, जैसा कि हुज़ूर आला हज़रत رضي الله عنه इरशाद फ़रमाते हैं कि कुफ़्फ़ार के साथ हम प्याला और हम निवाला होने से ज़रूरी इसका एहतिजाज़ करना है,

*📚 वक़ारूल फ़तावा, जिल्द 03, सफ़ह 238,*
*📚 फ़तावा अमजदिया, जिल्द 04, सफ़ह 148,*
*📚 फ़तावा रज़विया, जिल्द 09, सफ़ह 12,*

*👉 कुर्बानी का गोश्त किसी भी वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस, राफज़ी, शिया, (ग़ैर मुस्लिम) हरगिज़ ना दें और ना ही लें देना लेंना दोनों हराम है इनसे किसी भी तरह की हमदर्दी रखना जाइज़ नहीं*



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