वहाबी देवबंदी का ज़बीहा मुर्दार क्यों है और किताबी का ज़बीहा हलाल क्यों है जबके दोनों काफ़िर बददीन हैं
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*🥀 वहाबी देवबंदी का ज़बीहा मुर्दार क्यों है और किताबी का ज़बीहा हलाल क्यों है जबके दोनों काफ़िर बददीन हैं 🥀*
काफ़िर की 2, क़िस्मैं हैं असली और मुर्तद.
असली काफ़िर वो है जो शुरू से काफ़िर हो और कल्मा ए इस्लाम का मुन्किर हो.
फिर असली काफ़िर की भी 2. क़िस्मैं हैं.
मुनाफिक़ और मुजाहिर.
मुनाफिक़ वो काफ़िर है के बज़ाहिर कल्मा पढ़ता हो और दिल से इन्कार करता हो.
और मुजाहिर वो काफ़िर है के एलानया कल्मा ए इस्लाम का इन्कार करता हो.
इसकी 4. क़िस्में हैं
नं.1, दहरयाह
नं.2, मुशरिक
नं.3, मजूसी
इन सबका ज़बीहा मुर्दार है
और
नं.4, किताबी ये भी अगरचे कल्मा ए इस्लाम का एलानया इन्कार करता है मगर इसका ज़बीहा हलाल है
इस वजह से के अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल ने फ़रमाया➡
و طعا م ا لزیں ا اُتو ا ا لكتب حل لکم،
और हज़रत इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहु तआला अन्हुमा ने इस आयत ए करीमा की तफ्सीर में फ़रमाया➡
تعا مہم ذبيحت ہم
तो आयत ए मुबारक का खुलासा ये हुआ के किताबियों का ज़बीहा तुम्हारे लिए हलाल है के ज़िबह करने वाले का किसी आसमानी किताब पर ईमान रखना शर्त है
लिहाज़ा किताबी ने अगर मुसलमान के सामने ज़िबह किया और ये मालूम हो के अल्लाह का नाम लेकर ज़िबह किया है तो उसका ज़बीहा हलाल है
और अगर ज़िबह के वक़्त हज़रत
मसीह या हज़रत उज़ैर अलैहिमुस्सलाम का नाम लिया हो और मुसलमान के इल्म में ये बात हो तो ज़बीहा मुर्दार है.
और अगर मुसलमान था फिर किताबी हुआ तो उसका ज़बीहा भी मुर्दार है के वो मुर्तद है...
और मुर्तद वो काफ़िर है के कल्मा
गो होकर कुफ्र करे.
इसकी भी 2. क़िस्में हैं
मुजाहिर व मुनाफिक़
मुर्तद मुजाहिर वो है के पहले मुसलमान था फिर एलानया इस्लाम से फिर गया यानी दहरया
मुशरिक
मजूसी
या किताबी
वगैराह कुछ भी हो गया,
और मुर्तद मुनाफ़िक़ वो है के इस्लाम का कल्मा पढ़ता है और अपने आप को मुसलमान कहता है
मगर खुदा ए अज़्ज़ व जल्ल
व रसूलल्लाह सल्लललाहू तआला अलैही व सल्लम या किसी नबी की तौहीन करता है
या ज़रूरीयात ए दीन में से किसी चीज़ का मुन्किर है
जैसे आज कल के वहाबी देवबंदी
के ये इस्लाम का कल्मा पढ़ते हैं और अपने आप को मुसलमान कहते हैं
मगर अक़ाइद कुफ्रया जो इनके मोलवीयों ने अपनी किताबों में लिखे➡
📔 हिफ्ज़ुल इमान सफा.8,
📔 तहज़ीरुन्नास सफा 3...14...28...
और 📔 बराहीन क़ातअह सफा.51, और भी बहुत सी किताबों में मोजूद हैं उनकी बुनियाद पर
ये वहाबी देवबंदी अहले हदीस
मुर्तद यानी काफ़िर हैं
जैसा के मक्का मुअज़्ज़मा
मदीना तय्यबा
पाकिस्तान
हिन्दुस्तान
बंगाल
और वर्मा वगैराह
के सैकड़ों उल्मा ए किराम व मुफ्तीयान ए अज़ाम के फतावे वहाबी देवबंदीयों के बारे में
📗किताब, हुसामुल हरामैन
और
📗किताब, अस्सवारिमुल हिन्दीया
मैं शायअ (छप चुके हैं)
और मुर्तद अहकाम ए दुनिया में सब काफ़िरों से बदतर हैं
और मुस्तहिक़ ए क़त्ल हैं इससे जुज़या नहीं लिया जा सकता और
इसका निकाह
मुस्लिम
काफ़िर
या मुर्तद किसी से नहीं हो सकता
जिससे होगा महज़ ज़िना होगा,
और मुर्तद (यानी वहाबी देवबंदी वगैराह) का ज़बीहा इस वजह से हराम व मुर्दार है के वो कल्मा गो होकर कुफ्र करता है
ज़रुरयात ए दीन में से किसी का इन्कार करता है
फिर अगरचे वो किताबी हो जाय
तो भी इसका ज़बीहा मुर्दार है क्योंकि दीन ए इस्लाम छोड़ कर जिस दीन की तरफ वो चला गया उस पर भी उसे साबित न पाया जायेगा,
यानी ख्वाह किसी मिल्लत का दावा करे मुर्तद का दावा बेकार है...
📚📗फतावा बरकातयाह सफा.224---225---226)
ब हवाला इनयाह📘
हिदायाह📗
फतावा आलम गीरी📗
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