ईद सिर्फ गोश्त खोरी का दिन नही है
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*🥀 ईद सिर्फ गोश्त खोरी का दिन नही है 🥀*
*हजरत बरा बिन अज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते है कि इनके मामु हजरत बुरेदा बिन नियार रज़ियल्लाहु अन्हु ने हुजुर नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैह व सल्लम के जानवर ज़िब्हा करने से पहले कुरबानी कर दी और फरमाने लगे या रसूल्ल्लाहा ये वो दिन है जिसमे गोश्त कि ख्वाहीश करना मकरुह है, और मेने अपने बच्चो और हमसांयो और घरवालो के लिये जल्दी कुरबानी कर दी है तो नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैह व सल्लम ने फरमाया कि अपनी कुरबानी दोहराओ तो हजरत बुरेदाह ने कहा या रसूल्ल्लाहा मेने पास एक कम उम्र कि दुध पिती एक बकरी है जिसमे दौ बकरीयो के बराबर गोश्त है, तो आप नबी ए करीम ने फरमाया ये तुम्हारी दौनो कुरबानी से बेहतर है और तुम्हारे बाद किसी के लिये एक साल से उम्र कि बकरी करना काफी नही है*
*इस हदीस से पता चला है खास इस दिन को गोश्त कि तलब और गोश्त खाने कि निय्यत से कुरबानी करना मकरुह है बल्कि मकसद कुरबानी का ये होना चाहीये कि इससे अल्लाह का कुर्ब हासिल हो, और गरीबो मिस्किनो और घरवालो पर दस्तरख्वान वसी किया जाए उनको कुरबानी मे से गोश्त तकसिम किया जाए इसिलिये नबी ए करीम ने उनको पहले कुरबानी करने पर कोई मज़म्मत नही कि बल्कि एहसन तरीके से उनके लिये कम उम्र कि बकरी कि कुरबानी भी जायज़ कर दी*
*दुसरी बात इससे पता चलता है कि नबी ए करीम शरीयत बनाने वाले है जिसको जो हुक्म दे दे आपको इख्तियार है*
*तिसरी हम हनफियो कि इसमे दलिल है कि कुरबानी वाजिब है अगर वाजिब ना होती तो नबी ए करीम आप सहाबी को कुरबानी दोहराने का हुक्म ना फरमाते.!*
*📚 सही मुस्लिम हदीस 4955*
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